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Digestive care

बवासीर के लक्षण और कारण, और फ़िशर से फ़र्क़

बवासीर में ख़ून आता है पर दर्द नहीं; फ़िशर में तेज़ दर्द होता है। यह फ़र्क़ ज़रूरी है क्योंकि दोनों का इलाज अलग है, और ख़ून की कुछ और वजहें भी होती हैं।

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NutraHerbal संपादकीय टीम8 min read

Reviewed for accuracy and claims compliance: दावा-अनुपालन समीक्षा (claims review)

बवासीर उन बीमारियों में है जिनके बारे में लोग सबसे कम बात करते हैं और सबसे ज़्यादा ख़ुद इलाज करते हैं।

और यही सबसे बड़ा जोखिम है, क्योंकि मलद्वार से ख़ून आने की कई वजहें होती हैं, और बवासीर उनमें से एक है।

यह लेख जानकारी के लिए है, चिकित्सकीय सलाह नहीं। मलद्वार से ख़ून आए तो एक बार डॉक्टर को ज़रूर दिखाएँ, ख़ासकर अगर उम्र 40 से ऊपर है।

बवासीर क्या है

मलद्वार की नली में रक्त वाहिकाओं के गद्दे होते हैं, ये सबके होते हैं और मल रोकने में भूमिका निभाते हैं। जब ये बढ़ जाते हैं, भर जाते हैं, या बाहर आने लगते हैं, तब समस्या बनती है।

अंदरूनी बवासीर ऊपर की तरफ़ होती है, जहाँ दर्द की तंत्रिकाएँ नहीं होतीं। इसीलिए, और यह ज़रूरी बात है, अंदरूनी बवासीर में आम तौर पर ख़ून आता है पर दर्द नहीं होता।

बाहरी बवासीर नीचे की तरफ़, त्वचा में होती है, जहाँ पूरी संवेदना होती है। इसमें दर्द होता है, और अगर उसमें ख़ून का थक्का बन जाए तो दर्द बहुत तेज़ होता है।

लक्षण

  • चमकीला लाल ख़ून, काग़ज़ पर, या मल के बाद टपकता हुआ
  • ख़ून मल के ऊपर होता है, मल में मिला हुआ नहीं
  • मलद्वार पर गाँठ या उभार महसूस होना
  • खुजली और जलन
  • मल के बाद नमी या बलगम
  • ऐसा लगना कि पूरा नहीं निकला
  • ज़ोर लगाने पर कुछ बाहर आना, जो ख़ुद अंदर चला जाए या हाथ से अंदर करना पड़े

दर्द: अंदरूनी बवासीर में आम तौर पर नहीं। बाहरी में, या थक्का बनने पर, तेज़ दर्द।

बवासीर और फ़िशर का फ़र्क़, यह सबसे ज़रूरी हिस्सा है

भारत में सबसे ज़्यादा जो ग़लती होती है वह यह है: फ़िशर को बवासीर समझकर बवासीर की दवा लगाना। दोनों का इलाज अलग है।

बवासीरफ़िशर (चीरा)
क्या हैबढ़ी हुई रक्त वाहिकाएँमलद्वार की त्वचा में चीरा
दर्दआम तौर पर नहीं (अंदरूनी में)बहुत तेज़, मल के समय और बाद में
दर्द कैसा, जलन, काटने जैसा; कई घंटे रह सकता है
ख़ूनज़्यादा, टपकता हुआकम, लकीर जैसा
बाहर गाँठहो सकती हैआम तौर पर नहीं (पुराने में त्वचा का उभार)
डर, मल जाने से डर लगने लगता है

फ़िशर का सबसे पहचानने वाला लक्षण: मल जाते समय ऐसा तेज़ दर्द कि व्यक्ति मल जाने से डरने लगे, और फिर मल रोकने से क़ब्ज़ बढ़े, और क़ब्ज़ से फ़िशर और बिगड़े।

फ़िशर का इलाज अलग है: मल नरम करना, गर्म पानी में बैठना, और डॉक्टर द्वारा दी जाने वाली एक ख़ास मरहम जो मांसपेशी को ढीला करती है और ख़ून का बहाव बढ़ाती है ताकि चीरा भर सके। बवासीर की साधारण मरहम यह काम नहीं करती।

इसलिए: अगर दर्द तेज़ है, तो यह बवासीर से ज़्यादा फ़िशर हो सकता है, और डॉक्टर को दिखाना इसलिए भी ज़रूरी है।

ख़ून आने की और वजहें

ख़ून देखकर यह मान लेना कि बवासीर है, यही सबसे बड़ी भूल है।

  • फ़िशर, ऊपर बताया
  • संक्रमण, पेचिश, अमीबा। दस्त और बुख़ार के साथ। भारत में आम
  • आँत की सूजन वाली बीमारी (IBD), ख़ून के साथ बलगम, दस्त, पेट दर्द, वज़न घटना
  • पॉलिप, आम तौर पर दर्द नहीं; इनमें से कुछ आगे चलकर कैंसर बन सकते हैं, और कोलोनोस्कोपी में निकाले जा सकते हैं
  • आँत का कैंसर, और यही वजह है कि यह लेख लिखा गया है। शुरुआत में इसका ख़ून बवासीर जैसा ही लग सकता है

और एक ज़रूरी बात: बवासीर होना इस बात की गारंटी नहीं है कि कुछ और नहीं है। बवासीर इतनी आम है कि जाँच में मिल जाना आम बात है। अगर चेतावनी वाले लक्षण हैं, तो डॉक्टर बवासीर मिलने के बाद भी कोलोनोस्कोपी की सलाह दे सकते हैं, और यह ज़्यादा सावधानी नहीं, सही तरीक़ा है।

कारण

  • क़ब्ज़ और ज़ोर लगाना, सबसे बड़ा कारण
  • शौचालय पर देर तक बैठना, और फ़ोन ले जाना इसकी सबसे आम वजह बन गया है
  • दिन भर बैठे रहना, ड्राइवर, दफ़्तर का काम
  • गर्भावस्था और प्रसव, बहुत आम
  • ज़्यादा वज़न
  • भारी वज़न उठाना, साँस रोककर
  • लगातार दस्त भी
  • फ़ाइबर और पानी कम
  • उम्र
  • परिवार में होना
  • लंबे समय तक खड़े रहने वाला काम

असली इलाज: मल नरम करना

यह सबसे ज़रूरी हिस्सा है और सबसे ज़्यादा छोड़ा जाने वाला। लोग मरहम लगाते हैं और यही छोड़ देते हैं।

मरहम लक्षण ठीक करती है। मल नरम करना कारण ठीक करता है।

1. फ़ाइबर, धीरे-धीरे बढ़ाएँ। सब्ज़ी, दाल, छिलके वाले फल, साबुत अनाज, ईसबगोल, भीगे आलूबुख़ारा और अंजीर।

2. पानी, ढाई से तीन लीटर। और यह ज़रूरी है: पानी के बिना फ़ाइबर मल को और कड़ा करता है।

3. ज़ोर न लगाएँ। सबसे ज़रूरी एक बदलाव।

4. शौचालय पर देर तक न बैठें। फ़ोन बाहर छोड़ें। देर तक बैठना उन्हीं रक्त वाहिकाओं पर दबाव बनाता है।

5. इच्छा आए तो तुरंत जाएँ।

6. पैरों के नीचे स्टूल, पश्चिमी शौचालय में, ताकि घुटने कूल्हों से ऊँचे हों।

7. गर्म पानी में बैठना (सिट्ज़ बाथ)। 10–15 मिनट, दिन में दो-तीन बार। यह दर्द और ऐंठन में वाक़ई असर करता है और सबसे कम इस्तेमाल किया जाने वाला उपाय है।

8. रोज़ चलें।

9. सफ़ाई हल्के हाथ से, पानी से धोएँ, रगड़ें नहीं, थपथपाकर सुखाएँ। ख़ुशबू वाले वाइप्स और तेज़ साबुन जलन बढ़ाते हैं।

10. वज़न कम करें अगर ज़्यादा है।

तुरंत डॉक्टर के पास

तुरंत:

  • बहुत ज़्यादा ख़ून, या ख़ून के साथ चक्कर और घबराहट
  • मलद्वार पर कड़ी, बहुत दर्द वाली गाँठ, थक्का हो सकता है, और पहले एक-दो दिन में इलाज से तुरंत राहत मिलती है
  • बुख़ार के साथ तेज़ दर्द और सूजन, फोड़ा हो सकता है
  • बाहर आई बवासीर जो अंदर न जाए और रंग बदल जाए

जल्दी:

  • 40–45 से ऊपर नया ख़ून
  • गहरा लाल या काला ख़ून, या ख़ून मल में मिला हुआ
  • मल की आदत में बदलाव कुछ हफ़्तों से
  • मल पतला होना लगातार
  • बिना कोशिश वज़न घटना
  • ख़ून की कमी जाँच में, बवासीर से आम तौर पर गंभीर एनीमिया नहीं होता
  • परिवार में आँत के कैंसर का इतिहास
  • ख़ून के साथ बलगम या मवाद
  • सही देखभाल के बाद भी कुछ हफ़्तों में ख़ून बंद न हो
  • तेज़ दर्द, यह फ़िशर हो सकता है

जो इलाज मौजूद हैं

यह जानना ज़रूरी है क्योंकि लोग “ऑपरेशन” के डर से डॉक्टर के पास नहीं जाते, जबकि ज़्यादातर मामलों में ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं होती।

शुरुआती ग्रेड में: मल नरम करना, मरहम, और रबर बैंड लिगेशन, यह एक छोटी बाहरी प्रक्रिया है, जल्दी हो जाती है, आम तौर पर बेहोश करने की ज़रूरत नहीं।

आगे के ग्रेड में: स्टेपल्ड प्रक्रिया, लेज़र, धमनी बाँधने की तकनीक, और पारंपरिक ऑपरेशन।

बात का सार: हर ग्रेड के लिए असरदार इलाज है, और ज़्यादातर छोटे हैं। जितनी जल्दी, उतना छोटा इलाज।

गर्भावस्था में

गर्भावस्था और प्रसव के बाद बवासीर बहुत आम है, और आम तौर पर प्रसव के बाद काफ़ी सुधर जाती है।

इस दौरान इलाज मल नरम करने, गर्म पानी में बैठने और स्थिति पर केंद्रित होता है। कोई भी मरहम या खाने वाली दवा डॉक्टर से पूछकर ही, गर्भावस्था में सब कुछ उपयुक्त नहीं होता।

उत्पाद की ईमानदार भूमिका

हम इस श्रेणी में निर्माण करते हैं, इसलिए सीधी बात।

आयुर्वेद में हरीतकी और त्रिफला का उपयोग मल को नरम करने के संदर्भ में, और नागकेसर तथा अन्य जड़ी-बूटियों का अर्श संबंधी योगों में पारंपरिक रूप से मिलता है।

जो कहा जा सकता है: पारंपरिक उपयोग, मल त्याग में सहजता, स्थानीय असुविधा में आराम।

जो नहीं कहा जा सकता: बवासीर का इलाज, स्थायी रूप से ख़त्म करना, या ऑपरेशन की ज़रूरत टालना। ये चिकित्सकीय दावे हैं और हम ऐसे लेबल के लिए निर्माण नहीं करते।

और हम इस श्रेणी के लेबल पर एक पंक्ति ज़रूरी मानते हैं: कि मलद्वार से ख़ून आए तो डॉक्टर को दिखाएँ। इसकी वजह क़ानूनी सावधानी नहीं है, वजह यह है कि इस श्रेणी का नुक़सान साफ़ है: कोई साल भर बवासीर का इलाज करता रहे, और ख़ून की वजह कुछ और हो।

बवासीर के उत्पाद इसी बात पर बिकते हैं कि किसी को बताना न पड़े। वही उनकी ख़ूबी है और वही ख़तरा, इसलिए लेबल ही वह जगह है जहाँ यह बात ग्राहक तक पहुँच सकती है।

निचोड़

  1. बवासीर: ख़ून, दर्द नहीं (अंदरूनी में)
  2. फ़िशर: तेज़ दर्द, कम ख़ून, इलाज अलग है
  3. ख़ून देखकर बवासीर मान लेना सबसे बड़ी भूल
  4. ख़ून मल में मिला हो, या गहरा हो, यह अलग बात है, जाँच कराएँ
  5. 40–45 से ऊपर नया ख़ून = जाँच
  6. असली इलाज मल नरम करना है, मरहम नहीं
  7. पानी के बिना फ़ाइबर उलटा नुक़सान
  8. फ़ोन लेकर शौचालय में न बैठें
  9. गर्म पानी में बैठना, सबसे कम इस्तेमाल और असरदार उपाय
  10. हर ग्रेड का इलाज मौजूद है, जल्दी जाएँ, इलाज छोटा होगा

संरचना की जानकारी: Pilesovo 360। डॉक्टर के पास कब जाना है, विस्तार से: when piles needs a doctor।

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Reviewed by

Tarun Vashisht

Head of Ayurvedic Formulations & Regulatory Quality

Ayurvedic physician and pharmacognosy specialist with over 15 years of experience overseeing GMP-certified herbal extractions, classical proprietary formulations, and AYUSH/FSSAI regulatory compliance for direct-selling and retail nutraceutical brands.

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